Rubru (रूबरू)
❤"रूबरू"Rubru"❤
आज मैं खुदसे रूबरू हो रही हूँ
क्योंकि अबतक मैं भ्रम में जीती आ रही थी..
क्योंकि अबतक मैं भ्रम में जीती आ रही थी
कि मैं कभी अकेली नही पड़ूँगी क्योंकि
मेरे साथ इतने लोगों का प्यार जो है।
वक़्त जैसे जैसे बितता गया लोंगों के
चेहरे से पर्दे भी वैसे ही उठने लगे।
और देखते ही देखते मेरे भ्रम का घड़ा इतना भर गया...
कि देखते ही देखते मेरे भ्रम का घड़ा इतना भर गया कि
एक झटके में सारा भ्रम बाहर होकर बिखर गया।
अनजान थी मैं इस दुनिया से...
कि अनजान थी मैं इस दुनिया से
मुझे लगता था सब तो अपने ही है यहाँ
लेकिन पर्दे तो तब उठे जब असल मे हमें उनकी जरूरत थी।
लेकिन किसी में इतनी मज़ाल नहीं की वो हमें तोड़ सके...
कि किसी में इतनी मज़ाल नहीं की वो हमें तोड़ सके
क्योंकि भाईसाहब जब पहले ही टूटे हुए है तो अब क्या कोई तोड़ोगे
लेकिन ये भी ज़रूरी था....भ्रम का टूटना औऱ पर्दे का उठना।।
Thank You!😊
Wow...👍
ReplyDeleteIt's the reality which has been figure out by ur intelligent mind and beautiful Pen🌹🌹🙏🙏Lots of regards for this poetry nd writers too😊🙏
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